रिपोर्ट में खुलासा नेट जीरो कार्बन का लक्ष्य गैस इंवेस्टमेंट में कमी ला सकता है

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर की रिपोर्ट के अनुसार कोयले की कमी होने के बाद पूरे एशिया में तेजी से कोयले में निवेश हुआ है.

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रिन्यूएबल एनर्जी से दूर करता है. ये जलवायु और एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था दोनों के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है

रिन्यूएबल एनर्जी से दूर करता है. ये जलवायु और एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था दोनों के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है

CLIMATE CHANGE: एशिया में गैस से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर का एक्सपांशन 379 बिलियन डॉलर तक का आंका गया है. लेकिन ये कोयले के प्राकृतिक गैस में तब्दील होने की संभावनाओं पर आधारित हैं. लेकिन इसमें एसेट रिस्क की आशंकाएं भी अधिक हैं. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) की जून में पेश की गई एक रिपोर्ट के बाद इस रिस्क पर विचार शुरू हुआ. इस रिपोर्ट में एजेंसी ने लिखा है कि नेट जीरो एमिशन को वैश्विक स्तर पर हासिल करने के लिए फॉसिल फ्यूल के डेवलपमेंट पर रोक लगानी होगी. ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर की रिपोर्ट के अनुसार कोयले की कमी होने के बाद पूरे एशिया में तेजी से कोयले में निवेश हुआ है. इसकी वजह बड़े पैमाने पर सार्वजनिक विरोध, कोयला संयंत्र की बढ़ती लागत बताई जा रही है.

किन देशों में गैस पर निवेश?

जीरो कार्बन रिन्यूएबल पावर की जगह कई देश गैस में निवेश करना बेहतर समझ रहे हैं. एशिया के पूर्वी, दक्षिण पूर्वी और दक्षिणी हिस्से में नेचुरल गैस प्रोजेक्टस में निवेश बढ़ रहा है. 131 अरब डॉलर के नियोजित निवेश पर चीन का दबदबा है. चीन के अलावा वियतनाम, इंडोनेशिया, भारत, थाईलैंड, बांग्लादेश, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस, जापान, म्यांमार, ताइवान और पाकिस्तान में गैस में बड़े निवेश की योजना है. उनमें से, भारत, थाईलैंड और इंडोनेशिया ऐसे देश हैं जहां वर्तमान में निर्माणाधीन बुनियादी ढांचे में सबसे अधिक निवेश किया जा रहा है. रिपोर्ट में कहा गया है कि उनकी राशि क्रमशः $16 बिलियन, $8 बिलियन और $7 बिलियन है.

साल 2015 से भारत में कोयले से बनने वाली बिजली 250 Gw से घट कर 28 Gw तक पहुंच गई है. अब भारत में 29.5 अरब डॉलर की गैस परियोजनाएं विकसित हो रही हैं, जिनमें 1 जीडब्ल्यू गैस से चलने वाली बिजली, 21,000 किलोमीटर गैस पाइपलाइन और 68 मिलियन टन प्रति वर्ष (एमटीपीए) एलएनजी आयात क्षमता शामिल है.

जापान ने 2021 में अपने पूर्व नियोजित कोयला संयंत्रों को बंद कर दिया है. और कोयला संयंत्र से जुड़े वित्त को भी खत्म करने का वादा किया है. इसके अलावा जापान ने इस साल की शुरूआत में कोयला-टोगैस स्विचिंग सहित एशिया में कार्बोनाइजेशन परियोजनाओं के लिए पब्लिक और प्राइवेट फाइनेंस से 10 बिलियन डॉलर की मदद का वादा भी किया है. जापान फिलहाल 13 बिलियन डॉलर की गैस परियोजनाओं पर काम कर रहा है. जिसमें 15 Gw की गैस क्षमता वाली नई योजना भी प्रस्तावित है.

रिपोर्ट में वियतनाम स्न्यू पावर डेवलपमेंट प्लान (PDP) के नए प्रपोजल का भी हवाला दिया गया है. नए मसौदे के मुताबिक इस प्लान में किसी नए कोयला संयंत्र का प्रस्ताव नहीं है. सिर्फ पहले से निर्माणाधीन या फिर साल 2025 तक पूरी होने वाली योजना का जिक्र है. हालांकि PDP ने 18 Gw एलएनजी आधारित बिजली क्षमता की मांग की है. जो वियतनाम की 2030 तक की एनर्जी मिक्स का 13 प्रतिशत होगा.

हालांकि, चीन ने दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक कोयला संयंत्रों की योजना बनाना और निर्माण करना जारी रखा है. वैसे बिजली की कुछ अन्य जरूरतों के लिए चीन गैस की भी तलाश कर रहा है. चीन में अनुमानित रूप से $130.5 बिलियन की नई गैस परियोजनाओं को विकसित करने की योजना है, जिसमें 90 Gw नई गैस से चलने वाली बिजली क्षमता शामिल है.

साल 2020 में फिलीपींस ने भी उन कोयला संयंत्रों पर रोक लगा दी जो पहले से ही उसकी योजना का हिस्सा नहीं थे. अब ये देश 14 बिलियन डॉलर के साथ नई गैस परियोजना तैयार कर रहा है. साउथ कोरिया ने भी तय कर लिया है कि कोई नया कोयला संयंत्र तैयार नहीं होगा. साथ ही इसके लिए ओवरसीज फाइनेंस भी खत्म किया जाएगा. दक्षिण कोरिया अब 16.1 बिलियन डॉलर के गैस डेवलपमेंट प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है.

नेट जीरो कार्बन पर प्रभाव

इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले रॉबर्ट रोजिंस्की के मुताबिक एशियाई देशों में प्रस्तावित गैस प्रोजेक्ट्स जोखिम भरे हैं. इसमें 379 बिलियन डॉलर का दांव लगा है. एशिया में तैयार हो रहा गैस के उपयोग का ये इंफ्रास्ट्रक्चर सदी के मध्य तक नेट जीरो एमिशन को खतरे में डाल सकता है. इस स्थिति में वे ऐसे विकल्प के साथ रह जाएंगे जो उन्हें रिन्यूएबल एनर्जी से दूर करता है. ये जलवायु और एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था दोनों के लिए घाटे का सौदा साबित हो सकता है.

जीईएम के कार्यकारी निदेशक टेड नेस के मुताबिक मौजूदा गैस परियोजनाओं से पहले ही इतना उत्सर्जन हो रहा है. जिससे ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की क्षमता 50 प्रतिशत तक ही संभव है. एशियाई विकास बैंक, विश्व बैंक और अन्य द्वारा हाल की घोषणाओं से पता चलता है कि इन संस्थानों ने अभी तक गैस फाइनेंस से खुद को अलग नहीं किया है.

Published - October 28, 2021, 09:08 IST