Lockdown का 1 साल: कोरोना की जांच से 5 करोड़ वैक्सीन तक कैसे पहुंचा इंडिया, जानिए पूरा सफर

One Year Of Lockdown: सितंबर 2020 में ही सीरम इंस्टिट्यूट ने वैक्सीन कोविशील्ड का प्रोडक्शन शुरू कर दिया था और इसका स्टॉक बनाना शुरू किया

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Picture: PTI

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Lockdown: कोरोना को हमारे रोजमर्रा का हिस्सा बने एक साल हो गया है. एक साल पहले ही देशभर में सड़कें खाली, दुकानें बंद और वर्क फ्रॉम होम शुरू हो चुका था. एक साल कितने बदलाव ला सकता है ये कोरोना महामारी ने सिखाया. कोरोना महामारी ने दिखाया कि जरूरत पड़ने पर भाग-दौड़ की जिंदगी धीमी हो सकती है और घर के अंदर रहे भी सभी काम निपटाने पड़ सकते हैं. डिजिटल इंडिया की छोटे शहरों में भी पहुंच होने से इस दिक्कत के समय में राहत रही लेकिन इस एक साल के दौरान हेल्थ वर्कर्स, डॉक्टरों, रिसर्चर्स, कोरोना वॉरियर्स की मेहनत ने देश को इस संकट से उबारने में मदद किया. ना सिर्फ अस्पतालों में लगातार काम करते हुए बल्कि लैब्स में कोरोना की वैक्सीन पर लगातार रिसर्च करते हुए.

नया वायरस होने के कारण इसके खिलाफ लड़ाई कैसे हो, लोगों की सुरक्षा कैसे हो इसपर गहन रिसर्च की जरूरत थी. अकसर वैक्सीन को डेवलेप करने में काफी समय लगता है. पहले वायरस को पहचानकर उसके संक्रमण को समझना और इसका तोड़ निकालना होता है. फिर कई चरण के क्लिनिकल ट्रायल (Clinical Trial) – सुरक्षा और कार्य क्षमता की जांच के लिए जानवरों पर, फिर एक छोटे ग्रुप पर और फिर एक बड़े ग्रुप पर ट्रायल.

One Year Of Lockdown: रिसर्चर्स का योगदान

एक साल पहले जब किसी ने इस वायरस का नाम तक नहीं सुना था, तब एक साल के अंदर क्लिनिकल ट्रायल (Clinical Trial) पूरा कर वैक्सीन का इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना भी अविश्सनीय लगता है. लेकिन ऐसा संभव हुआ है – भारत के पहले के वैक्सीनेशन मिशन के अनुभवों और दुनिया की फार्मेसी होने की वजह से इसमें बड़ी मदद मिली. जहां एक साल पहले देशभर में कोविड-19 टेस्ट करने के लिए सिर्फ एक लैब थी वहीं अब भारत में तकरीबन 5 करोड़ को वैक्सीन दी जा चुकी है.

साथ ही हाल ही की कैबिनेट की बैठक के बाद प्रकाश जावड़ेकर और स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वर्धन ने भी इस बात का भरोसा दिया है कि कई और वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है और इन्हें मंजूरी मिलने से भारत की वैक्सीनेशन ड्राइव को रफ्तार मिलेगी.

भारत में फिलहाल दो वैक्सीन का इमरजेंसी इस्तेमाल हो रहा है. इसमें से सीरम इंस्टिट्यूट (SII) ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका की डेवलेप की वैक्सीन कोविशील्ड का प्रोडक्शन कर रहा है.

नए साल से नई शुरुआत

साल 2021 पहली तारीख से ही उम्मीदों वाला रहा. 1 जनवरी को सीरम इंस्टिट्यूट (SII) की मैन्युफैक्चर की इस वैक्सीन को सब्जेक्ट एक्सपर्ट कमिटी ने इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए मंजूरी देने की सिफारिश की और 3 जनवरी को ड्रग कंट्रोलर से इसे मंजूरी भी मिल गई. वहीं देश के अंदर ही डेवलप की भारत बायोटेक की कोविड-19 वैक्सीन कोवैक्सिन (Covaxin) को भी क्लिनिकल ट्रायल के दौरान ही इमरजेंसी इस्तेमाल को मंजूरी दी गई. इन दो वैक्सीन के दम पर 16 जनवरी से स्वास्थ्य कर्मियों और कोरोना वॉरियर्स को वैक्सीन देना का काम शुरू हुआ.

मंजूरी से पहले शुरू हो गया था प्रोडक्शन

One Year Of Lockdown: एस्ट्राजेनेका ने अगस्त में वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल (Clinical Trial) शुरू कर दिया था. कंपनी ने US, UK और कई और देशों में क्लिनिकल ट्रायल किया था. ट्रायल के नतीजों तक पहुंचने में कई महीनों का समय लगता है. इस दौरान सीरम इंस्टिट्यूट के CEO आदर पूनावाला ने पहले ही ऐलान कर दिया था कि वैक्सीन को इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए मंजूरी से पहले ही वे इसकी मैन्युफैक्चरिंग शुरू करने का रिस्क ले रहे हैं. सितंबर 2020 में ही सीरम इंस्टिट्यूट ने वैक्सीन का प्रोडक्शन शुरू कर दिया था और इसका स्टॉक बनाना शुरू किया ताकि जैसे ही मंजूरी मिले वैसे ही इस्तेमाल के लिए वैक्सीन उपलब्ध हो और कोरोना की रोकथाम जल्द से जल्द हो. रिपोर्ट्स के मुताबिक SII हर मिनट 5000 डोज तक मैन्युफैक्चर कर रहा था.

कोवैक्सीन विवाद

तीसरे फेज के ट्रायल के नतीजों के पहले ही कोवैक्सीन (Covaxin) को इस्तेमाल के लिए मंजूरी देने से बड़े विवाद का जन्म हुआ लेकिन भारत बायोटेक ने जब तीसरे चरण का डाटा जारी किया तो सभी को इसपर भरोसा हुआ. 3 मार्च 2021 को कोवैक्सीन ने तीसरे चरण के ट्रायल की रिपोर्ट जारी की और बताया कि वैक्सीन की कारगर क्षमता 81 फीसदी है. इससे पहले 1 मार्च को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैक्सीनेशन के दूसरे चरण की शुरुआत में कोवैक्सीन का डोज लगवाकर इसपर भरोसा जताया.

तीसरे चरण के क्लिनिकल रिपोर्ट के बाद कोवैक्सीन से ‘क्लिनिकल ट्रायल’ (Clinical Trial) का टैग हटा और अब इसे मंगोलिया, मॉरिशस, श्रीलंका जैसे कई और देशों में एक्सपोर्ट करने की तैयारी है.

इंट्रानेसल वैक्सीन का क्लिनिकल ट्रायल शुरू

कोवैक्सीन की सफलता के बाद अब भारत बायोटेक इंट्रानेसल वैक्सीन (Intranasal Vaccine) का क्लिनिकल ट्रायल शुरू कर चुका है. ये वैक्सीन नाक के जरिए दी जाएगी और इसका सिर्फ एक डोज देने की जरूरत होगी. क्योंकि इस वैक्सीन में सुई की जरूरत नहीं होगी, इस वैक्सीन के सफल होने से कम लॉजिस्टिक की जरूरत होगी और आसानी से दी भी जा सकेगी. इसके साथ ही तेजी से वैक्सीनेशन हो पाएगा. भारत बायोटेक के मुताबिक इस वैक्सीन का प्रोडक्शन ज्यादा तेजी से किया जा सकेगा और ये बच्चों को भी दी जा सकेगी. अब तक जिन जानवरों पर इसका टेस्ट हुआ है उसमें नतीजे अच्छे रहे हैं – कोरोना संक्रमण ब्लॉक करने और इसके ट्रांसमिशन को रोकने में मदद मिली है. इस इंट्रानेसल वैक्सीन का अब लोगों पर क्लिनिकल ट्रायल शुरू हो चुका है.

भारत अब दुनिया भर के 72 देशों और WHO की वैक्सीनेशन मुहीम कोवैक्स के तहत वैक्सीन का एक्सपोर्ट कर रहा है.

Published - March 24, 2021, 01:33 IST