तमिलनाडु मॉडलः महज दिखावे के लिए न हों नामचीन लोगों की नियुक्तियां

एक्सपर्ट्स को उनसे मिलने वाले परिणामों के फोकस के आधार पर चुनना चाहिए और ये काम सिर्फ सुर्खियां बटोरने के लिए नहीं होना चाहिए.

तमिलनाडु मॉडलः महज दिखावे के लिए न हों नामचीन लोगों की नियुक्तियां
रिजर्व बैंक ने बैंकों को ऐसे मामले में नर्म रुख रखने के लिए कहा है.

चाणक्य के सम्राट चंद्रगुप्त और उनके बेटे बिंदुसार के सलाहकार बनने के बाद से ही सभी शासकों की समझ में सलाहकारों की अहमियत आ गई थी. बाद में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं बनने के बाद भी ये चलन जारी रहा. हाल में ही तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन उस वक्त सुर्खियों में आ गए जब उन्होंने नोबल विजेदा एस्थर डफलो, अर्थशास्त्री जीन ड्रेजे, RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन, केंद्र के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम और पूर्व वित्त सचिव एस नारायण की टीम को अपने यहां बतौर सलाहकार नियुक्त किया.

भारत में केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर सरकारों को सलाह के लिए एक्सपर्ट्स को नियुक्त करना चाहिए. देश के सामने मौजूदा आर्थिक-सामाजिक चुनौतियों से निपटने के लिए एक बड़े टैलेंट पूल की जरूरत भी है. साथ ही ये वक्त ऐसा है जबकि लंबी पारी खेल चुके मशहूर एक्सपर्ट्स से आगे बढ़कर सोचा जाए. एक्सपर्ट्स को उनसे मिलने वाले परिणामों के फोकस के आधार पर चुनना चाहिए और ये काम सिर्फ सुर्खियां बटोरने के लिए नहीं होना चाहिए. सरकारों के लिए दिखावे के लिए ऐसे एडवाइजर्स की नियुक्ति करना बेहद आसान है.

2020 में कोविड की पहली लहर के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए एक्सपर्ट्स की एक टीम नियुक्त की थी. इसमें नोबल पुरस्कार विजेता अभिजीत बनर्जी (जो कि डफलो के पति भी हैं), WHO में संक्रामक बीमारियों के पूर्व डायरेक्टर स्वरूप सरकार, प्रमुख डॉक्टर सुकुमार मुखर्जी और अभिजीत चौधरी शामिल थे. हालांकि, सरकार ये नहीं बता पाई कि इस चुनौती से लड़ने में बनर्जी या सरकार का क्या योगदान रहा.

चूंकि, आम लोगों का पैसा इन एक्सपर्ट पर खर्च होता है, ऐसे में सरकारों को समय-समय पर लोगों को बताना चाहिए कि ये एक्सपर्ट क्या सलाह दे रहे हैं और उससे क्या फायदा हो रहा है. अगर ये प्रैक्टिस अपनाई जाती है तो इससे केवल सुर्खियां पैदा करने के लिए नामचीन हस्तियों को बतौर सलाहकार नियुक्त करने की गतिविधि पर रोक लग सकती है. इन एक्सपर्ट्स में कई ऐसे भी होते हैं जिनके पास योगदान देने के लिए कुछ नहीं होता है. या ये ऐसे होते हैं जिनके पास अपने पुरस्कारों के साथ खाली वक्त बिताने के अलावा कुछ नहीं होता.

हालांकि, यहां कहने का आशय ये नहीं है कि तमिलनाडु के नियुक्त किए गए सलाहकारों का कद कम है या उनसे कोई फायदा नहीं होने वाला है. हम ये कहना चाहते हैं कि सभी सरकारों को कोई भी नियुक्ति इससे मिलने वाले परिणामों के आधार पर ही करनी चाहिए और लोगों को होने वाले फायदे इसके केंद्र में होने चाहिए.

 

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