कूपन बॉन्ड क्या हैं, निवेशक को कैसे होता है फायदा और इसमें कितना है रिस्क

Coupon Bonds: ये एक ऋण दायित्व है. यह निवेशक को अतिरिक्त ब्याज प्राप्त करने का एक आसान तरीका प्रदान करता है.

  • Vijay Parmar
  • Publish Date - October 2, 2021 / 03:15 PM IST
कूपन बॉन्ड क्या हैं, निवेशक को कैसे होता है फायदा और इसमें कितना है रिस्क
भारत सरकार को क्रमश: 148 करोड़ रुपये, 294 करोड़ रुपये, 67 करोड़ रुपये और 24 करोड़ रुपये लाभांश के रूप में दिए हैं

Coupon Bonds: कॉरपोरेट संस्थाओं जैसे कंपनियों और सरकारी संस्थानों जैसे राज्य सरकार, केंद्र सरकार, नगर पालिकाओं द्वारा अपनी परियोजनाओं के लिए धन जुटाने के लिए जारी किए गए ऋण साधन को बॉन्ड कहते हैं. ऐसे बॉन्ड जारी करने के बाद उन्हें परिपक्वता तिथि पर उधारकर्ता को मूल राशि का भुगतान करना होता है. ये बॉन्ड पंजीकृत नहीं हैं, इसलिए बॉन्ड के धारक को मालिक माना जाता है, इस कारण स्टॉक एक्सचेंजों और ओवर द काउंटर (OTC) बाजारों में इनका ट्रेडिंग हो सकता हैं. कूपन बॉन्ड को बॉन्ड कूपन या बियरर बॉन्ड के रूप में भी जाना जाता है. ये एक ऋण दायित्व है. यह निवेशक को अतिरिक्त ब्याज प्राप्त करने का एक आसान तरीका प्रदान करता है.

कूपन बॉन्ड को समझें

कूपन बॉन्ड भौतिक प्रमाण पत्र या कूपन के बजाय दर का एक संदर्भ मात्र है. आमतौर पर, वे प्रति कूपन अर्ध-वार्षिक भुगतान करते हैं. जारी करने की तिथि पर आपको प्राप्त होने वाली यील्ड को कूपन दर कहते है. उच्च मूल्य कूपन रेट निवेशकों को आकर्षक लगती है क्योंकि वे उच्च यील्ड प्रदान करते हैं.

आमतौर पर, आधुनिक बॉन्ड भौतिक प्रमाणपत्रों के साथ पंजीकृत बॉन्ड होते हैं जिनमें पंजीकृत धारक का नाम और ऋण की शर्तें शामिल होती हैं. पंजीकृत धारक को जारीकर्ता संस्थान से स्वचालित रूप से ब्याज भुगतान प्राप्त होगा.
कुछ बॉन्ड बुक-एंट्री बॉन्ड के रूप में होते हैं, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप से पंजीकृत होते हैं और जारीकर्ता और उसके निवेशकों से जुड़े होते हैं. इस कैटेगरी में निवेशक को सर्टिफिकेट की जगह रसीदें मिलती हैं. निवेशकों को वित्तीय संस्थानों द्वारा नियंत्रित खाते भी मिलते हैं. वे इन खातों के माध्यम से अपना ब्याज भुगतान प्राप्त करते हैं.

कूपन दर

आमतौर पर कूपन को कूपन दर के आधार पर वर्णित किया जाता है, यानी कि एक कूपन बॉन्ड भुगतान की तारीख पर यील्ड प्रदान करता हैं. कूपन रेट बदल सकता है. कूपन रेट की गणना प्रति वर्ष भुगतान किए गए सभी कूपनों के योग से की जाती है और इसे बॉन्ड के अंकित मूल्य से विभाजित किया जाता है. बॉन्डधारक कंपनी या सरकारी संस्थान के लेनदार होते हैं. उन्हें एक निश्चित ब्याज दर का भुगतान किया जाता है जो बॉन्ड पर निर्दिष्ट होता है. इस ब्याज दर को कूपन के रूप में जाना जाता है. इसे कूपन दर, कूपन प्रतिशत दर और नाममात्र उपज के रूप में भी जाना जाता है. एक कूपन फ्लोटिंग या वेरिएबल रेट का भी हो सकता है. बॉन्ड के परिपक्व होने तक निवेशकों को सालाना कूपन का भुगतान किया जाता है.

इसकी गणना इस प्रकार की जाती है:

कूपन दर = उधारकर्ता द्वारा किया गया कुल वार्षिक भुगतान / बॉन्ड की फेस वैल्यू

जीरो-कूपन बॉन्ड किसे कहते हैं?

हालांकि बॉन्ड धारक आमतौर पर कूपन भुगतान प्राप्त करते हैं, लेकिन एक विशिष्ट प्रकार का बॉन्ड होता है जो कूपन का भुगतान नहीं करता है और इसे जीरो-कूपन बॉन्ड के रूप में जाना जाता है. इसे प्योर डिस्काउंट बॉन्ड या डीप डिस्काउंट बॉन्ड भी कहा जाता है.

जीरो-कूपन बॉन्ड की गणना:

बांड की कीमत = बॉन्ड की फेस वैल्यू / (1+R) ^N (ब्याज की गणना सालाना की जाती है)
जिसमें; R= ब्याज दर और N= परिपक्वता के वर्षों की संख्या.

निवेशकों को कैसे होता है फायदा?

जारी करने के समय, इन बॉन्ड को डिस्काउंट पर खरीदा जाता है, जो कूपन की फेस वैल्यू से कम कीमत पर होता है. जबकि, मैच्योरिटी के समय निवेशक बॉन्ड को उसकी फेस वैल्यू पर रीडिम करता है. इश्यू प्राइस और बॉन्ड की फेस वैल्यू के बीच का अंतर वह लाभ है जो निवेशक बनाता है. इस प्रकार के बॉन्ड में नो कूपन भुगतान सुविधा के परिणामस्वरूप पुन:निवेश जोखिम समाप्त हो जाता है. हालांकि, ब्याज दर में उतार-चढ़ाव से उत्पन्न मूल्य में कमी की संभावना के कारण बॉन्ड को ब्याज दर के जोखिम का सामना करना पड़ता है.

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